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गोपाल की भक्ति से अभिभूत हुए प्रभु ..

संतजनों ने उन्हें गौ चराने की जिम्मेदारी दे है और जंगल जाते समय भोजन के लिए कच्ची सामग्री साथ रख देते हैं. साथ ही गोपाल को सीख देते हैं कि अब श्रीराम ही तुम्हारे पिता हैं और उन्हें भोजन कराए बगैर भोजन ग्रहण नहीं करना है.

- रामलीला में जय-विजय को मिला ऋषियों का श्राप.
- रासलीला व रामलीला के लिए देर रात तक जमी रही हजारों श्रद्धालुओं की भीड़.

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर: महर्षि खाकी बाबा सरकार के 50 वें निर्वाण दिवस के अवसर पर श्री सीताराम विवाह महोत्सव एवं विशाल सत्संग समारोह का आयोजन के दौरान सुबह से ही कार्यक्रमों का आयोजन होते रहा. नया बाजार स्थित विवाह महोत्सव स्थल पर भक्तिमय वातावरण कायम हो गया है. आश्रम पर सुबह 6 बजे से ही रामचरितमानस का सामूहिक नवाह परायण, इसके बाद अपराह्न 2 बजे से 4:30  बजे तक कृष्ण लीला एवं 5 बजे से 6 बजे तक झांकी एवं पदगायन विश्वनाथ शुक्ला श्रृंगारी जी के द्वारा किया गया. इसके साथ ही सायं 7 बजे से 9 बजे तक समागत आचार्य व विद्वत जनों द्वारा कथा कीर्तन एवं प्रवचन का आयोजन किया गया. रात्रि 9 बजे से 12 बजे तक रामलीला का आयोजन हुआ.

गोपाल की भक्ति से संतों को हुआ आश्चर्य: 

रासलीला में फतेहकृष्ण शर्मा ने भक्त गोपाल चरित्र के प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि, यह भान होते ही कि संसार में रिश्ते स्वार्थ की नींव पर टिके हैं. भक्त गोपाल वैराग्य लेकर परिवार छोडक़र संतों के साथ चल देते हैं. संतजनों ने उन्हें गौ चराने की जिम्मेदारी दे है और जंगल जाते समय भोजन के लिए कच्ची सामग्री साथ रख देते हैं. साथ ही गोपाल को सीख देते हैं कि अब श्रीराम ही तुम्हारे पिता हैं और उन्हें भोजन कराए बगैर भोजन ग्रहण नहीं करना है.

इस सीख पर अमल करते हुए भोजन तैयार कर गोपाल के आह्वान पर श्रीराम आते हैं और गोपाल के हिस्से का भोजन भी चट कर जाते हैं. अगले दिन गोपाल दो जनों के लिए भोजन सामग्री ले जाते हैं तो श्रीराम के साथ माता सीता भी आती हैं और गोपाल फिर भूखे रह जाते हैं. तीसरे दिन जब लक्ष्मण भी उनके साथ आते हैं, तो चौथे दिन गोपाल पांच जनों के लिए भोजन सामग्री लेकर जाते हैं. इस दिन उनके साथ भरत और शत्रुघ्न भी भोजन पर आ जाते हैं और गोपाल को लगातार चौथे दिन भूखा रहना पड़ता है. पांचवे दिन गोपाल फिर अतिरिक्त सामग्री लेकर जाते हैं तो संतों को संशय होता है. उधर, जंगल में जाकर गोपाल भोजन तैयार नहीं करते. जब श्रीराम अपने भाइयों, माता सीता और हनुमान के साथ आते हैं तो पता चलता है कि गोपाल ने भोजन नहीं पकाया है. श्रीराम के आने पर वे सभी को भोजन पकाने की जिम्मेदारियां सौंपकर खुद भगवान की सेवा में लग जाते हैं.

इस बीच जब संत यह देखने के लिए जंगल में आते हैं कि, गोपाल इतनी सामग्री का करता क्या है तो देखते हैं कि, हनुमान, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न व माता सीता भोजन पकाने की व्यवस्था में जुटे हैं तो अवाक रह जाते हैं. उन्हें गोपाल तो सेवा करता दिखता है लेकिन भगवान श्रीराम के दर्शन नहीं होते. इस संशय को जब संतजन गोपाल से कहते हैं तो गोपाल भगवान श्रीराम से इसकी वजह पूछता है. उस समय भगवान बताते हैं कि, संतों के पास ज्ञान तो बहुत है, लेकिन भक्ति का मूल भाव नहीं है, इसीलिए वह श्रीराम को नहीं देख पा रहे.

आज की लीला में गोपाल भक्त का अभिनय रमेशचन्द्र शर्मा ने किया जबकि, पत्नी का अभिनय नित्यगोपाल ने, पिता का अभिनय रामवीर शर्मा ने, माता का किरदार रोहित ने, पुत्र के रुप में विष्णु, संत के रूप में बच्चू राम कोठारी, रामजी का किरदार लखन शर्मा, सीताजी का अभिनय वीरेन्द्र शर्मा, लक्ष्मण का किरदार श्यामवीर, शत्रुघ्न के रूप में राजकुमार जबकि, हनुमान के रूप में देव प्रकाश ने अभिनय किया. 

रामलीला में जय विजय लीला का हुआ है आयोजन:

सनकादिक ऋषि भगवान विष्णु से मिलने के लिए उनके आवास पर पहुंचते हैं. भगवान विष्णु से मिलने के लिए जैसे ही उनके दरवाजे पर कदम रखते हैं, जय विजय दोनों पार्षद ऋषियों को अंदर जाने से रोक लेते हैं. उनके इस प्रकार मना करने पर सनकादिक ऋषियों ने कहा, "अरे मूर्खों! हम तो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं. हमारी गति कहीं भी नहीं रुकती है. हम देवाधिदेव के दर्शन करना चाहते हैं. तुम हमें उनके दर्शनों से क्यों रोकते हो? तुम लोग तो भगवान की सेवा में रहते हो, तुम्हें तो उन्हीं के समान समदर्शी होना चाहिये. भगवान का स्वभाव परम शान्तिमय है, तुम्हारा स्वभाव भी वैसा ही होना चाहिये. हमें भगवान विष्णु के दर्शन के लिये जाने दो. ऋषियों के इस प्रकार कहने पर भी जय और विजय उन्हें बैकुण्ठ के अन्दर जाने से रोकने लगे. जय और विजय के इस प्रकार रोकने पर सनकादिक ऋषियों ने क्रुद्ध होकर कहा, भगवान विष्णु के समीप रहने के बाद भी तुम लोगों में अहंकार आ गया है और अहंकारी का वास बैकुण्ठ में नहीं हो सकता. इसलिये हम तुम्हें श्राप देते हैं कि तुम लोग पाप योनि में जाओ और अपने पाप का फल भुगतो उनके इस प्रकार श्राप देने पर जय और विजय भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे.

यह जान कर कि सनकादिक ऋषिगण भेंट करने आये हैं भगवान विष्णु स्वयं लक्ष्मी जी एवं अपने समस्त पार्षदों के साथ उनके स्वागत के लिय पधारे. भगवान विष्णु ने उनसे कहा, हे मुनीश्वरों! ये जय और विजय नाम के मेरे पार्षद हैं. इन दोनों ने अहंकार बुद्धि को धारण कर आपका अपमान करके अपराध किया है. आप लोग मेरे प्रिय भक्त हैं और इन्होंने आपकी अवज्ञा करके मेरी भी अवज्ञा की है. इनको शाप देकर आपने उत्तम कार्य किया है. इन अनुचरों ने तपस्वियों का तिरस्कार किया है और उसे मैं अपना ही तिरस्कार मानता हूँ. मैं इन पार्षदों की ओर से क्षमा याचना करता हूँ. सेवकों का अपराध होने पर भी संसार स्वामी का ही अपराध मानता है. अतः मैं आप लोगों की प्रसन्नता की भिक्षा चाहता हूँ.

भगवान के इन मधुर वचनों से सनकादिक ऋषियों का क्रोध तत्काल शान्त हो गया. भगवान की इस उदारता से वे अति अनन्दित हुये और बोले, आप धर्म की मर्यादा रखने के लिये ही अपने इतना आदर देते हैं. हे नाथ! हमने इन निरपराध पार्षदों को क्रोध के वश में होकर श्राप दे दिया है इसके लिये हम क्षमा चाहते हैं. आप उचित समझें तो इन द्वारपालों को क्षमा करके हमारे श्राप से मुक्त कर सकते हैं.

भगवान विष्णु ने कहा, हे मुनिगणों! मैं सर्वशक्तिमान होने के बाद भी ब्राह्मणों के वचन को असत्य नहीं करना चाहता क्योंकि इससे धर्म का उल्लंघन होता है. आपने जो शाप दिया है वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है. ये अवश्य ही इस दण्ड के भागी हैं. ये दिति के गर्भ में जाकर दैत्य योनि को प्राप्त करेंगे और मेरे द्वारा इनका संहार होगा. ये मुझसे शत्रुभाव रखते हुये भी मेरे ही ध्यान में लीन रहेंगे. मेरे द्वारा इनका संहार होने के बाद ये पुनः इस धाम में वापस आ जाएंगे.



















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