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Buxar Top News: सरकार या फिर सिस्टम की लापरवाही,आखिर क्यों सामूहिक आत्मदाह की बात कर रहे हैं तीन सौ से ज्यादा परिवार !


नगर का एक शैक्षणिक संस्थान अपनी बदहाली पर अपनी दुर्दशा पर आँसू बहाने को मजबूर है.


- 42 वर्षों पूर्व स्थापित संस्था के अस्तित्व पर खड़े हो रहे हैं सवाल.
- संस्था के कर्मी हैं भुखमरी के शिकार.

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर: सत्ता में आने के बाद जहां एक ओर जनप्रतिनिधि विभिन्न परियोजनाओं के उद्घाटन एवं शिलान्यास में लगे रहते हैं, वहीं पुरानी परियोजनाओं एवं जनकल्याणकारी संस्थाओं की दुर्दशा से उन्हें कुछ लेना देना नहीं होता है. जबकि, जितना आवश्यक नई कार्ययोजनाओं को बनाना है पुरानी संस्थाओं को बचाना उससे कहीं कम आवश्यक नहीं है. 

बक्सर तथा आसपास के इलाकों के बहुतेरे युवाओं को चिकित्सक बनाने वाली या यूं कहें बक्सर की धरती से डॉक्टर्स की नई पौध पैदा करने वाली एक संस्था आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने को मजबूर है. हम बात कर रहे हैं नगर के कोइरपुरवा मोहल्ले में स्थित श्री धन्वंतरि आयुर्वेद महाविद्यालय की. 2 जुलाई 1972 को स्थापित यह संस्था 13 नवंबर 1975 को ही बिहार सरकार से मान्यता प्राप्त कर न जाने कितने ही चिकित्सकों को देश की सेवा में भेज चुकी है, बावजूद इसके सरकार की उदासीनता के कारण यह संस्था आज खुद ही बीमार हो गई है !

 संस्था की बदहाली की कहानी बताते हुए प्राचार्य रामेश्वर सिंह ने जो बताया उसे सुनने के बाद जनता की खुशहाली के लिए तत्पर रहने का दावा करने वाली सरकार का असली चेहरा सामने आ जाता है. प्राचार्य ने बताया की संस्था को मान्यता मिलने के बाद सन 1975 से 1990 तक मुजफ्फरपुर स्थित बिहार यूनिवर्सिटी के द्वारा आयुर्वेदिक चिकित्सक परीक्षार्थियों की परीक्षाएं आयोजित की जाती रही. उन्होंने यह भी बताया कि इस दौरान प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष में 125 के लगभग विद्यार्थी मौजूद रहे. इसके बाद से सरकारी उदासीनता एवं कुछ लोगों की साजिश के कारण सरकार ने इस संस्थान पर से अपना ध्यान हटा दिया एवं परीक्षाओं का संचालन इस संस्था में बंद कर दिया गया. जिसके बाद कॉलेज प्रबंधन ने पुनः व्यवस्था की बहाली को लेकर कई बार सरकार से गुहार लगाई जिस पर विचार करते हुए बिहार विधानसभा की याचिका समिति ने माना की संस्था की पुनः बहाली नहीं होने से कई छात्रों का भविष्य अधर में है. जिसके बाद समिति ने कॉलेज के पुनः बहाल करने की अनुशंसा 1989 में कर दी. 

अब इसे दुर्भाग्य कहें या कुछ और पुनः बहाली के अनुशंसा के बावजूद वर्ष 2011 तक सरकार के द्वारा किसी भी तरह का कोई प्रयास संस्था को पुनः शुरू करने के लिए नहीं किया गया. जिसके बाद बिहार सरकार के तत्कालीन स्वास्थ्य एवं वर्तमान में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने वर्ष 2011 में इस शैक्षणिक संस्थान को पुनः बहाल करने का आदेश दिया. बावजूद इसके, आदेश पर कोई पहल सरकार अथवा विभाग द्वारा अब तक नहीं की गई. प्राचार्य ने बताया कि कॉलेज में कुल 310 कर्मी(शैक्षणिक एवं गैर शैक्षणिक) कार्यरत है तथा कॉलेज से प्राप्त वेतन की राशि उनकी नियमित आमदनी का एकमात्र जरिया था. लेकिन कॉलेज के बंद हो जाने के बाद यह उम्मीद भी पूरी तरह से खत्म हो गई. 

कॉलेज में कार्यरत प्राध्यापक डॉ. रामनरेश सिंह ने बताया कि कॉलेज के बंद हो जाने से जहां एक और बहुत सारे छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है. वहीं संस्था के कार्यरत सभी कर्मियों के समक्ष भुखमरी की स्थिति हो गई है. ऐसे में सरकार अगर कोई विशेष पहल नहीं करती है तो इस संस्था के सभी कर्मी अपने परिवारों के साथ आत्मदाह करने को मजबूर होंगे। 

बहरहाल, अब देखना यह होगा कि कॉलेज में कार्यरत कर्मियों की दु:खद व्यथा पर सूबे में चल रही कथित सुशासन की सरकार  की नजरें इनायत कब होती है.
 














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