Buxar Top News: सिय-पिय मिलन महोत्सव: रामलीला में मनु-शतरुपा प्रसंग का हुआ मंचन, प्रवचन के दौरान बताई गई श्रद्धा की महत्ता ..
शनिवार को सिय-पिय मिलन महोत्सव का तीसरा दिन था.
- 48 वें सिय-पिय मिलन महोत्सव का आज था तीसरा दिन.
- सुबह 6 बजे से ही भक्तिमय हुआ वातावरण.
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर: विगत 48 वर्षों से श्री हरि गुरु वैष्णव कृपा से श्री महर्षि खाकी बाबा सरकार के 48 वें निर्वाण दिवस के अवसर पर श्री सीताराम विवाह महोत्सव एवं विशाल सत्संग समारोह का आयोजन दूसरे दिन भी सुबह से ही कार्यक्रमों का आयोजन होते रहा. गुरुवार से नया बाजार स्थित विवाह महोत्सव स्थल पर भक्तिमय वातावरण कायम हो गया है.
श्री सीताराम विवाह महोत्सव में शानिवार को सर्वप्रथम सुबह 6 बजे S श्री राम चरितमानस का नवाहण परायण पाठ किया गया जिसके बाद भजन कीर्तन, रासलीला में भक्त मीराबाई प्रसंग का मंचन स्वामी श्री हरिवल्लभ शर्मा(छोटे ठाकुर) वृन्दावन के निर्देशन में किया गया.
मीरा का विवाह राणा सांगा के पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोज राज के साथ सन 1516 में संपन्न हुआ. उनके पति भोज राज दिल्ली सल्तनत के शाशकों के साथ एक संघर्ष में सन 1518 में घायल हो गए और इसी कारण सन 1521 में उनकी मृत्यु हो गयी. उनके पति के मृत्यु के कुछ वर्षों के अन्दर ही उनके पिता और श्वसुर भी मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के साथ युद्ध में मारे गए.
ऐसा कहा जाता है कि उस समय की प्रचलित प्रथा के अनुसार पति की मृत्यु के बाद मीरा को उनके पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया किन्तु वे इसके लिए तैयार नही हुईं और धीरे-धीरे वे संसार से विरक्त हो गयीं और साधु-संतों की संगति में कीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं.
कृष्ण भक्ति
पति के मृत्यु के बाद इनकी भक्ति दिनों-दिन बढ़ती गई. मीरा अक्सर मंदिरों में जाकर कृष्णभक्तों के सामने कृष्ण की मूर्ति के सामने नाचती रहती थीं. मीराबाई की कृष्णभक्ति और इस प्रकार से नाचना और गाना उनके पति के परिवार को अच्छा नहीं लगा जिसके वजह से कई बार उन्हें विष देकर मारने की कोशिश की गई.
ऐसा माना जाता है कि सन् 1533 के आसपास मीरा को ‘राव बीरमदेव’ ने मेड़ता बुला लिया और मीरा के चित्तौड़ त्याग के अगले साल ही सन् 1534 में गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर कब्ज़ा कर लिया. इस युद्ध में चितौड़ के शासक विक्रमादित्य मारे गए तथा सैकड़ों महिलाओं ने जौहर किया. इसके पश्चात सन् 1538 में जोधपुर के शासक राव मालदेव ने मेड़ता पर अधिकार कर लिया जिसके बाद बीरमदेव ने भागकर अजमेर में शरण ली और मीरा बाई ब्रज की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ीं. सन् 1539 में मीरा बाई वृंदावन में रूप गोस्वामी से मिलीं. वृंदावन में कुछ साल निवास करने के बाद मीराबाई सन् 1546 के आस-पास द्वारका चली गईं.
तत्कालीन समाज में मीराबाई को एक विद्रोही माना गया क्योंकि उनके धार्मिक क्रिया-कलाप किसी राजकुमारी और विधवा के लिए स्थापित परंपरागत नियमों के अनुकूल नहीं थे. वह अपना अधिकांश समय कृष्ण के मंदिर और साधु-संतों व तीर्थ यात्रियों से मिलने तथा भक्ति पदों की रचना करने में व्यतीत करती थीं.
आज के मंचन में मुख्य कलाकार भगवान कृष्ण के रुप में कन्हैया जी, राधा रानी की भूमिका में पुण्डरीक जी,
मीरा की भूमिका में कृष्णवीर, राणा जी की भूमिका में रामवीर तथा सहायक कलाकार राजू,श्याम जी शर्मा,मास्टर रामबाबू,श्याम जी रहे.
वाद्ययंत्रों के सफल संचालन में तबला वादक कन्हैया
ऑर्गन पर राजेश बैन्जू पर मिथिलेश, पैड पर मुकेश ने अपनी संगत दी.
इसके पश्चात श्री विश्वनाथ शुक्ल श्रृंगारी जी मिथिला की मंडली के द्वारा झांकी एवं पदगायन हुआ.
इस दौरान मलूक पीठाधीश्वर श्रीराजेन्द्र दास जी महाराज के द्वारा प्रवचन कार्यक्रम के दौरान कहा कि बगैर दैन्यता के भक्ति हृदय में निवास नही कर सकती. "भक्ति महारानी" श्रवण मार्ग से ही हृदय में प्रवेश करती है, लेकिन उनको उपयुक्त आसन नही मिलता तो आके वापस चली जाती है. भक्ति महारानी का दैन्यता ही आसन है, इसलिए हृदय में दैन्यता का भाव अनिवार्य है अहम शून्य अन्तःकरण में ही भक्ति निवास करती है. श्री द्वाराचार्य जी ने कहा भगवत सद्गुरु शरणागति धारण करने से ही दैन्यता आती है. धर्मात्मा पुरुष की पहचान है वो श्रद्धावान होता है और श्रद्धावान का सदा शुभ होता है समर्थ से समर्थ सन्त भी किसी जीव को सद्गुरु के रूप में मिल जाये लेकिन उसकी बुद्धि सद्गुरु के प्रति मनुष्यात्मक है तो उसका कल्याण सम्भव नहीं. वेद गुरु वचनो में विश्वास का नाम है श्रध्दा. साधक की सबसे श्रेष्ठ पूंजी है श्रद्धा. श्रद्धावान की सत्संगति से श्रध्दा उत्तरोत्तर बढ़ती है. और श्रद्धा शून्य मनुष्य के संग से घटती है. इसलिए भक्त भगवन्त की कथा श्रवण करना चाहिए.
दूसरी तरफ रामलीला में आश्रम के परीकरो के द्वारा मनु शतरूपा एवँ श्री राम जन्म प्रसंग का मंचन किया गया.
जिसमे राजा दशरथ जी की भूमिका में श्री राजाराम शरण जी महाराज वशिष्ठ जी के रूप में अमरकांत, कौशल्या जी की भूमिका, विजय पाण्डेय, मनु जी की भूमिका में उमेश भाई
शतरूपा जी के रुप पिंटू जी, सुमित्रा जी के रुप में प्रिंस, श्रृंगि ऋषि एवँ मदारी के रुप मे बजरंगी बाबा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.









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