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माता अहिल्या के उद्धार स्थल से हुआ पंचकोशी यात्रा का शुभारंभ ..

सर्वप्रथम वे अहिरौली पहुंचे जहां उन्होंने गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या को पुनः नारी रूप प्रदान किया था. भगवान श्री राम के स्पर्श मात्र से पत्थर के रूप में परिणित माता अहिल्या पुनः अपने नारी स्वरूप को प्राप्त कर सकी थी. 
अहिल्या माता मंदिर में पूजा-अर्चना करते श्रद्धालु

- चल रही है पांच दिवसीय पंचकोशी यात्रा.
- नारद मुनि के आश्रम पर होगा दूसरा पड़ाव.
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अहिल्या माता मंदिर के बाहर लगी श्रद्धालुओं की भीड़

बक्सर टॉप न्यूज़
, बक्सर: ऐतिहासिक पंचकोशी परिक्रमा की शुरुआत रविवार को हो गई. इस दौरान प्रातः काल श्रद्धालु गंगा स्नान कर रामेश्वर नाथ मन्दिर में  भगवान शंकर के दर्शन करने के पश्चात अहिरौली पहुंचे. अहिरौली पंचकोशी यात्रा का पहला पड़ाव है पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रेता युग में जब भगवान राम शिक्षा ग्रहण करने बक्सर आए थे उस दौरान ताड़का वध के बाद उन्होंने पंचकोश में स्थित ऋषियों से उनके आश्रम में पहुंच आशीर्वाद लिया था.
रामरेखा घाट से यात्रा शुरु करते संत

सर्वप्रथम वे अहिरौली पहुंचे जहां उन्होंने गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या को पुनः नारी रूप प्रदान किया था. भगवान श्री राम के स्पर्श मात्र से पत्थर के रूप में परिणित माता अहिल्या पुनः अपने नारी स्वरूप को प्राप्त कर सकी थी. ऐसी मान्यता है कि, अहिरौली में उन्होंने वहां पुए-पकवान का भोग लगाया था. इसीलिए हर वर्ष पंचकोशी परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु अहिरौली में माता अहिल्या का  भक्ति भाव से पूजन करते हैं,  तत्पश्चात वे पुए-पकवान का प्रसाद ग्रहण करते हैं.
गुरही जलेबी लेने को लगी भीड़
श्रद्धालुओं का लगा रहा तांता, खूब भाई गुरही जलेबी : 

पंचकोशी परिक्रमा के दौरान  अहिल्या माता मंदिर के  समीप मेले का आयोजन किया गया था. इस दौरान मंदिर के आसपास विभिन्न प्रकार की दुकानें सजी थी. दुकानों पर खिलौनों, चाट पकोड़ों के अलावे प्रसिद्ध गुरही जलेबी की कई दुकानें सजी हुई थी. अहिरौली पहुंचने वाले श्रद्धालुओं ने सर्वप्रथम माता अहिल्या के दर्शन करने के पश्चात जमकर मेले का लुत्फ़ उठाया. इस दौरान बच्चों ने जहाँ खिलौने खरीदने में रुचि दिखाई वहीं दूसरी तरफ गुरही जलेबी तथा अन्य पकवानों का भी आस्वादन किया. 

गोड़ऊ नृत्य प्रस्तुत करते कलाकार

गोड़ऊ नृत्य ने भी बांधा समां: 

हर वर्ष की तरह इस बार भी गोड़ समुदाय के लोगों ने मंदिर के समीप अपने लोक नृत्य (गोड़ऊ नृत्य) को  प्रस्तुत किया जिसे देखने के लिए लोगों की भीड़ देर तक जमी रही. गोड़ आदिवासी समाज के लोक कलाकार बताते हैं कि अब लोगों में परंपरा के प्रति लगाव कम हुआ है. उनकी नई पीढ़ी का भी झुकाव परंपरा कक जीवित रखने की ओर नहीं है . ऐसे में कभी कभी यह भी लगता है जैसे भविष्य में उनकी सांस्कृतिक विरासत की संभालने वाला भी कोई नहीं रहेगा.
आज नारद मुनि के आश्रम पर होगा पड़ाव:

पहले दिन की यात्रा की समाप्ति के बाद श्रद्धालु अब गुरुवार को नारद मुनि के आश्रम नदांव पहुंचेंगे जहाँ कल वे सत्तू तथा मूली का प्रसाद ग्रहण करेंगे.



















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