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आस्था का महापर्व: अथ श्री सेल्फ़ी कथा ..

उसमें फ्यूज़न है आधुनिकता की, पोगापंथी की, संस्कृति की, जाहिलियत की, वह कुछ नहीं है, वह सेल्फ़ी हैं. वह भूखा हैं. छठ घाट पर उसकी कई भूख दिखी भी है. लेकिन सेल्फ़ी विथ छठ में वह मस्त हैं. 

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर: सूर्य के अस्त होते ही छठ पर्व की छटा निखरने लगी हैं. छठ से लौटे लोगों की सेल्फियां हिलकोरें लेने लगी हैं. ताबड़तोड़ सोशल मीडिया पर छठ की छटा में अपनी छटपटाती आत्मश्लाघा करवट लेने लगी हैं. व्हाट्सएप फेसबुक और अन्य मीडिया में सेल्फ़ी की भरमार हो गई हैं, गोया कि सूर्य के अस्त होने तक ही सेल्फी रुका हुआ था. प्रकृति का सूर्य डूबते ही मानस के सूर्य ने अपना दर्प दिखाना शुरू कर दिया है और छठ पर्व तो इसका भाष्य नहीं टीका था. 

बक्सर के गंगा तट मानो जीवन की उजरती शाम में एक कुपढ़ मतवाले अधर्मी और अपने बेदम अभिलाषा औऱ अहंकार से दबे एक युवक की कथा है जो सेल्फ़ी में दिखता है. वह कल ही दिल्ली से अंडा करी खाकर, आज प्याज लहसुन भी नहीं खाया है और घाट पर घोर धार्मिक बनकर अपनों के साथ सेल्फ़ी अपलोड किया है. सेल्फ़ी में न घाट है, न छठ मइया है न उसकी खुद की माँ है, वह स्वयं पर्व है, उत्सव है और सेल्फ़ी उसका उत्स हैं. वह कल तक पिज़्ज़ा मंगाता रहा, कल ठेकुआ पर ऐसा मुँह बनाएगा कि कोई अफ्रीकी व्यंजन खा रहा हो. हाथ मे  दो इंच का रक्षा सूत्र पहने गर्दन में विंध्याचल का ताबीज़ तो अंगुली में टोपाज पहन रखा है उसे बड़े बने की महत्वकांक्षा भी है, भद्र भी रहना है, छठ पर्व और होली में पायजामें में भी दिखना हैं. सेल्फ़ी सबका साध्य है. भद्रता की, मनुष्यता की, महत्वकांक्षी होने की, धार्मिक ढोंग की आदि-आदि.. सब समाहित हैं. 


उसे किसी भाषा के व्याकरण का इल्म नहीं है. वह कट पेस्ट जानता है लेकिन बौद्धिक विलास में भी अव्वल रहना है. वह वामपंथी भी है लेकिन पंडी जी मंगलवार को उसे भुखवा रहे है.  वह निरा पिपासु है, भक्षी है, इसलिए तो वह भूखा है और उसकी भुखमरी ही सेल्फ़ी हैं. उसका स्वयं का ही अस्तित्व उसके लिए दंड है और सेल्फ़ी उसकी सजा है. वह इस इंडिया का नया नागरिक हैं. उसमें फ्यूज़न है आधुनिकता की, पोगापंथी की, संस्कृति की, जाहिलियत की, वह कुछ नहीं है, वह सेल्फ़ी हैं. वह भूखा हैं. छठ घाट पर उसकी कई भूख दिखी भी है. लेकिन सेल्फ़ी विथ छठ में वह मस्त हैं. वह बाज़ार भी है, वह इस बाजार की खुराक भी है. वह पल्सर पर भी है, दोस्त अपाची पर है लेकिन वह केवल सेल्फ़ी है क्योंकि उसे न पल्स है जीवन की न ही उसके अपने ऊँचाई पर जाने की अपाची है. वह निरा भोगी है. छठ की सेल्फ़ी यहीं बताती है. वह निरा हिप्पी है. उसे न छठ पर्व से लेना है न कल उगते सूर्य को प्रणाम करना है. वह बस प्रसाद खायेगा, दिल्ली, सूरत मुम्बई जाना है बस सेल्फ़ी के लिए ही तो आया था. उसकी सेल्फ़ी ही छठ पूजा है और उसकी स्वयं की ही पूजा तो सेल्फ़ी है. उग हो सुरुजदेव, विहान के बेर???? ...
- बोल बच्चन गुरु@गंगा घाट



















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