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भय प्रकट कृपाला, दीनदयाला .. राम जन्म प्रसंग का हुआ मंचन

रघुकुल के वंशजों के जन्म के साथ ही अयोध्या में मंगलाचार सुनाई देने लगता है. भगवान शंकर स्वयं मदारी का वेश धर हनुमान जी के साथ वहां पहुंचते हैं. इसके साथ ही लीला प्रसंग का समापन होता है तथा भगवान के जयघोष वातावरण गुंजायमान हो जाता है.

- सिय पिय मिलन महोत्सव के दौरान रामलीला तथा रासलीला का हुआ आयोजन.
- राम जन्म की खबर सुन मदारी बनकर पहुंचे भगवान शंकर.

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर: महर्षि खाकी बाबा सरकार के 50 वें निर्वाण दिवस के अवसर पर श्री सीताराम विवाह महोत्सव एवं विशाल सत्संग समारोह का आयोजन के दौरान सुबह से ही कार्यक्रमों का आयोजन होते रहा। नया बाजार स्थित विवाह महोत्सव स्थल पर भक्तिमय वातावरण कायम हो गया है. आश्रम पर सुबह 6 बजे से ही रामचरितमानस का सामूहिक नवाह परायण, इसके बाद अपराह्न 2 बजे से 4:30  बजे तक कृष्ण लीला एवं 5 बजे से 6 बजे तक झांकी एवं पदगायन विश्वनाथ शुक्ला श्रृंगारी जी के द्वारा किया गया. इसके साथ ही सायं 7 बजे से 9 बजे तक समागत आचार्य व विद्वत जनों द्वारा कथा कीर्तन एवं प्रवचन का आयोजन किया गया. रात्रि 9 बजे से 12 बजे तक रामलीला का आयोजन हुआ.

भक्त दामा को संकट से बचाने के लिए भगवान पांडुरंग ने धरा महार का वेश:

रासलीला में आज भक्त दामा चरित्र का मंचन किया गया. जिसमें भक्त दामा के रूप में रमेश चंद्र शर्मा, नवाब के रूप में बची राम शर्मा, मुंशी के रूप में निरंजन शर्मा, राधा के रूप में वीरेंद्र शर्मा, कृष्ण के अभिनय में लखन शर्मा इत्यादि ने मुख्य पात्र निभाया.

भक्त दामा चरित्र के मंचन में दिखाया गया कि, अनेक वर्ष पूर्व मंगलवेढा गांव में दामाजीपंत नाम के एक भक्त रहते थे. वे विदर्भ सम्राट की राजसभा में बडे पद पर नौकरी कर रहे थे. सम्राट की नौकरी प्रामाणिकता से करने के लिए उनका बडा नाम था. राजसभा का कामकाज समाप्त होनेपर बचा हुआ समय वे भगवान पांडुरंग के भजन-पूजन में बिताते थे .

एक बार राज्य में भीषण सूखा फैल गया. जानवर चारा-पानी बिना तड़प-तड़प कर मरने लगे. गरीब जनता पर खाली पेट रहने की बारी आई. यह देखकर दामाजीपंत का मन हिल गया. उन्होंने सोचा कि, सम्राट के कोठर धन धान्य से लबालब भरे हुए हैं. ऐसी स्थिति में प्रजा को भूख से तडपकर मरने देना ठीक नहीं. अत: दामाजीपंत ने गावों में ढिंढोरा पीटकर बताया कि, सारे लोग सरकारी गोदाम से आवश्यकतानुसार धान ले जाएं. लोगों ने ढिंढोरा सुना. सबके लिए स्वयं दामाजीपंत ने गोदाम का द्वार खोल दिया. लोगों के झुंड धान के गोदाम की ओर जाने लगे. सम्राट से बिना पूछे दामाजीपंत ने गोदाम से धान लोगों में बांटा, यह बात हवा जैसी फैली. सम्राट ने यह पता चलते ही आरक्षकों को आज्ञा दी कि, दामाजीपंत को बंदी बनाकर राजसभा में उपस्थित किया जाए.

इधर ये सब बातें सर्वज्ञानी भगवान पांडुरंग जान गए तथा भक्तों का संकट दूर करने हेतु उन्होंने एक युक्ति सोची. भगवान पांडुरंग ने स्वयं महार का रूप लिया. उन्होंने फटे वस्त्र धारण कर पीठपर कंबल, हाथ में लाठी, सिर पर साफा तथा उसपर छोटी मोहरों की थैली लेकर अनोखा भेष बनाया तथा वह सम्राट की राजसभा में उपस्थित हुए. तब रूप बदलकर आए भगवान पांडुरंग को देखकर, ‘तुम कौन हो, कहां से आए हो, तुम सिर पर क्या लाए हो?’, ऐसे एक ही समय में अनेक प्रश्न सम्राट ने किए. उसपर भगवान पांडुरंग ने अपना परिचय करवाते हुए कहा, ‘‘ मैं मंगलवेढा का महार, विठू; दामाजी का चाकर”, ऐसा कहकर उसने अपने सिर से थैली खाली करनी आरंभ की. देखते ही देखते सुवर्ण मोहरों का बडा ढेर सम्राट के सामने लग गया. यह चमत्कार देखकर सम्राट तथा राजसभा से दूसरे सरदार, सबने आश्चर्य से दांतों तले अंगुली दबा ली. इधर, आरक्षकों ने दामाजीपंत को बंदी बनाकर सम्राट के सामने उपस्थित किया; किंतु सम्राट ने दामाजीपंत की हथकडी हटाने को कहकर उन्हें स्वतंत्र किया तथा घटी घटना का सारा वृत्तांत बताया. यह सब देखकर तथा सुनकर दामाजीपंत के ध्यान में तुरंत सारी घटना आई. अपने भक्त का संकट टालने हेतु पांडुरंग को महार बनकर चाकर का काम करना पडा, इसका उन्हें बहुत बुरा लगा. उनका गला भर आया.

अयोध्या में हुआ राम का जन्म, मदारी बनकर पहुंचे भगवान शंकर:

उधर रामलीला में आज आश्रम के परिकरों और वृंदावन की रासलीला मंडली के द्वारा फतेह कृष्ण शास्त्री के निर्देशन में प्रभु श्री राम जन्म एवं बाल लीला का भव्य मंचन हुआ जिसमें दिखाया जाता है कि दशरथ जी अपने दरबार में उदास बैठे हैं. मंत्री सुमंत कहते हैं कि, आप क्यों दुखी हैं तब दशरथ जी बताते हैं कि उनकी कोई संतान नहीं है. इसलिए बहुत दुखी है. तब सुमंत जी कहते हैं कि आप वशिष्ठ जी को अपनी बात सुनाएं. राजा दशरथ वशिष्ट जी के पास पहुंचते हैं. वशिष्ट जी ने उन्हें सरयू नदी के तट पर पुत्रेष्टि यज्ञ करने की सलाह देते हैं. तत्पश्चात राजा दशरथ सरयू नदी के तट पर बैठ यज्ञ प्रारंभ करते हैं. यज्ञ के दौरान अग्नि देव प्रकट होते हैं तथा खीर का प्रसाद उन्हें प्रदान करते हुए कहते हैं कि यह प्रसाद अपनी रानियों को खिलाना. जिसके बाद तुम्हे चार पुत्र उत्पन्न होंगे. अग्निदेव की बात मान राजा दशरथ रानियों को प्रसाद खिलाते हैं, जिससे 4 पुत्र प्राप्त होते हैं. रघुकुल के वंशजों के जन्म के साथ ही अयोध्या में मंगलाचार सुनाई देने लगता है. भगवान शंकर स्वयं मदारी का वेश धर हनुमान जी के साथ वहां पहुंचते हैं. इसके साथ ही लीला प्रसंग का समापन होता है तथा भगवान के जयघोष वातावरण गुंजायमान हो जाता है.



















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